मासिक शिवरात्रि 2021 : शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या वाले मासिक शिवरात्रि पर जरूर करें ये उपाय, दूर होगा शनि दोष

Masik Shivratri 2021 cgsandesh
मासिक शिवरात्रि 2021

5 सितंबर को मनाई जाएगी भाद्रपद की मासिक शिवरात्रि

मासिक शिवरात्रि शुभ मुहूर्त (Masik Shivratri Shubh Muhurat)
05 सितंबर, रविवार को सुबह 08:23 मिनट और 26 सेकेंड पर चतुर्दशी तिथि आरंभ होगी. भगवान शिव की पूजा का शुभ मुहूर्त रात्रि: 11:57 मिनट से, 06 सितंबर 2021, सोमवार को प्रात: 12:43 मिनट तक बना हुआ है. चतुर्दशी तिथि का समापन, 06 सितंबर को प्रात: 07:38 मिनट पर होगा.

मासिक शिवरात्रि व्रत कथा (masik shivratri vrat katha)
कहते हैं मासिक शिवरात्रि की कथा पाठन और श्रवण भर से ही जीवन की समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है. मासिक शिवरात्रि की कथा का जिक्र पुराणों में मिलता है. पौराणिक कथा के अनुसार चित्रभानु नाम का एक शिकारी साहूकार का कर्जदार था. वे अपने परिवार का पालन पोषण जंगल में जानवरों का शिकार करके करता था. साहूकार का समय से कर्ज न चुका पाने के कारण साहूकार ने उसे बंदी बनाकर शिवमठ में डाल दिया. उस दिन शिवरात्रि होने के कारण मठ में शिवरात्रि की व्रत कथा हो रही थी. शिकारी ने वो कथा बहुत ही ध्यान से सुनी. साहूकार द्वारा शाम को शिकारी से ऋण के बारे में पूछने पर उसने अगले दिन सारा ऋण देने की बात कही. शिकारी की ये बात सुनकर साहूकार ने उसे मुक्त कर दिया. शिकारी बंदी बने होने कारण उस समय काफी भूखा था. वे जंगल में शिकार की इंतजार में बैठा रहा, लेकिन अंधेरा होने के कारण उसे कुछ न मिल सका. शिकारी तालाब के किनारे शिवलिंग के पास एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा. पड़ाव बनाते समय शिवलिंग पर ढेर सारे बेलपत्र टूटकर शिवलिंग पर गिरते गए. इस प्रकार अनजाने में दिनभर उनका व्रत हो गया, रात काटने के इंतजार में उसने शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ा दिए और रात्रि जागरण भी हो गया.

रात का एक पहर बीत जाने के बाद उसे गर्भिणी हिरणी दिखाई दी, लेकिन हिरणी के निवेदन पर शिकारी ने उसे छोड़ दिया, इसके बाद निवृत्त हिरणी और फिर बच्चों के साथ हिरणी आई लेकिन उसने सभी के निवेदन पर उन्हें छोड़ दिया. इस तरह शिकारी का पूरी रात का उपवास हो गया. इसके बाद सुबह के समय उसे एक मृग दिखाई दिया. उसने मृग का शिकार करने का फैसला किया. लेकिन मृग ने शिकारी से कहा कि अगर तुम मुझ से पहले तीनों हिरणियों का शिकार किया होता, तो मेरा भी शिकार कर लेते. परंतु अगर आपने उनको जीवन दान दिया है तो मुझे भी जीवनदान दे दो. शिकारी ने मृग को भी छोड़ दिया. इस प्रकार सुबह हो गई. शिवरात्रि पर उपवास, रात्रि जागरण, शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही सही पर शिकारी का शिवरात्रि का व्रत पूर्ण हो गया और उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई.
शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या लगने पर व्यक्ति को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस समय कुंभ, मकर व धनु राशि पर शनि की साढ़ेसाती और मिथुन, तुला राशि पर शनि की ढैय्या चल रही है। ज्योतिष में शनि को पापी और क्रूर ग्रह कहा जाता है। शनि के अशुभ होने पर व्यक्ति का जीवन बुरी तरह से प्रभावित हो जाता है। शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए भगवान शंकर की पूजा- अर्चना करनी चाहिए। भगवान शंकर की कृपा से सभी तरह के दोषों से मुक्ति मिल जाती है। 5 सितंबर, रविवार को मासिक शिवरात्रि है। हर माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन विधि- विधान से भगवान शंकर की पूजा- अर्चना की जाती है। शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के अशुभ प्रभावों से मुक्ति के लिए इस पावन दिन भगवान शंकर का गंगा जल से अभिषेक करें और श्री रुद्राष्टकम का पाठ करें। श्री रुद्राष्टकम का पाठ करने से भगवान शंकर की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आप रोजाना भी श्री रुद्राष्टकम का पाठ कर सकते हैं।
    श्री रुद्राष्टकम

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥

  निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌ ।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌ ॥

  तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌ ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥

  चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्‌ ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

  प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌ ।
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्‌ ॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्‌ ।
न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥

  न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌ ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥

  रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये
ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति।।

    ॥  इति श्रीगोस्वामीतुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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